मेरे शब्द
न जानें मेरे शब्द अब मेरी
सुनते ही नहीं
न जाने कौनसी कीचड़,
में धंसे हैं ।
वर्षों पहले मेघ गरजे,
और वर्षा हुई ।
न जाने क्यों......... कीचड़ ये
सूखी ही नही
क्या सूर्य नहीं उगा अभी तक
मेरे अंतर्मन का
क्या अभी तक घनघोर अंधेरा है
मेरे भीतर में
क्या मैं प्रतीक्षरत हूं नई सुबह की
मेरे व्याकुल मन में.............
शब्द घूम जाते हैं गोल मेरे
शब्द चूम जाते हैं ओष्ठ मेरे
परंतु सार्थकता सिद्ध नहीं करते
मेरे शब्द दिल की नहीं सुनते।
शब्दों का अपना संसार है
शायद मै उनके अनुकूल नहीं
शब्दों के प्रयोग के लिए
शायद मेरी रूह ही प्रतिकूल रही।
शब्द दिखाते हैं आडंबरो को
ढकोसलों को ।
शब्द दिखाते हैं नैतिकता को
प्रयोजनों को ।
शब्द देते हैं मान भरी सभा में,
शब्द देते हैं अभिमान इस जहां में ।
शब्द से होती मर्यादा की रक्षा,
शब्द देते बिखेर कुलीनों की आशा।
शब्द फेंकते हैं कभी जाल,
शब्द देते हैं कभी घाव
शब्द करते हैं कभी तार- तार।
शब्द देते हैं कभी मरहम का काम,
शब्द बनाते हैं कभी संसार
कभी शब्द देते हैं संहार
शब्दों को है स्वयं का ज्ञान
जो समझ ले शब्दों की महिमा
वो नहीं रह सकता अज्ञान।।।।।।।
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