शिष्य की कलम से
👩👦 आज भी याद है,
कक्षा का वो दृश्य
नए नए शिक्षक का कक्षा में आना
कक्षा का खुशी के मारे उत्साहित हो जाना
आखिर काफी जतन से जो मिले थे गुरुजी
थे तो अंग्रेजी के शिक्षक
पर उनका हिंदी मे शायरी सुनाना
जो कुछ इस प्रकार थी।
"जीत बुरी लगती है, हार अच्छी लगती है,
तुम लोगो को हमारी, हर बात बुरी लगती हैं"
वैसे तो अपनी कक्षा में
बहुत सभ्य थे हम,
अनुशासित बच्चों में अग्रणी थे हम.... परंतु
शायरी सुनकर मन का कवि जागा,
और हमने शायरी का प्रत्युत्तर दे डाला।
जो कुछ इस प्रकार थी _____
"हार बुरी लगती है, जीत अच्छी लगती है,
हम लोगो को आपकी हर बात अच्छी लगती है।"
फिर न जाने क्या हुआ
हमें समझ नहीं आया
शायद उस शिक्षक का अहम डगमगाया
और वो ज़ोर से चिल्लाया,
"ए खड़ी हो जा, घणी बोल री
मैं बणाऊंगा तनै शायर "
कुछ तार जैसा मारक यंत्र था हाथ में उनके
उन्होंने तब तक बजाया , जब तक मन नहीं भरा
अब हमनें रोना शुरु किया
और कक्षा के बाकी बच्चों ने हंसना
कुछ घनिष्ट मित्रों ने दया दिखाई
और प्राचार्य जी से शिकायत की सलाह दे डाली।
पहले तो डरे हम , फिर चले गए हम
अपने एक साथी को लेकर
जो सबसे ज्यादा संवेदना व्यक्त कर रहा था
प्राचार्य जी नदारद थे विद्यालय से
फिर एक अन्य शिक्षक को हमने अपना दुखड़ा सुनाया
वो शिक्षक मुस्कुराया,
और बदले में हमने कुछ नही पाया।
आज भी याद है कक्षा का वो दिन
जब हम आहत हुए है थे
हम आज तक नहीं समझे
वहां कौन सी शिक्षा नीति काम करती हैं
इसे पावेल ने बनाया था या थोर्न डाइक ने समझाया था
किस नियम से उन्होंने हम पर डंडा चलाया था।
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