तेरा प्यार
शायद तेरे प्यार के दायरे
मेरे आसमान से छोटे थे
दरम्यान तेरे प्यार के
मै किनारों से फिसल गई !
जब जब मैंने पुकारा तुझे
तू अपने दायरों में ही सिमटा रहा।
तुमने खुलकर कभी, हंसी को न जिया
मेरी हंसी आसमान की रौनक थी।
तेरे दायरों में मेरी हंसी न बंध सकी
हवा के बहावों से वो गूंजती रही।
कुछ जैसे सिमटा है तुझमें
जिससे मै लिपटी रही।
शायद मेरा जहां बसा है तुझमें
जिसमे मैं बसी रही।
तू रूह को छू सकता है मेरी
मै रूह हूं जिस्म नहीं
कुछ कट सा रहा है
हम दोनों के बीच में।
शायद रूह का बंधन है
अब ये जिस्मानी ही सही।
कभी रूठी को मनाओ तो सही
कभी अपनापन दिखाओ तो सही
चांद लाने का वादा करती हूं
कभी पैर बढ़ाओ तो सही।।।।।।।।।।।।।।।।
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