कर्म
नहीं चर्म को पूजता कोई, ना ही शीश नवाता है बिना कर्म के तो प्रभु का भी सुमिरन नही हो पाता है। उनसे भी इच्छा रहती है , हमारे लिए कुछ खास करें। तो तुम तो एक अबल मानव हो तुमको कैसे याद करे। यदि कर्म तेरे किसी लायक होंगे तो, जग उनका ही गुणगान करे।।।।। तू बिन कर्मों के चाहे वैभव वो तो शायद तुझे मिल जाएगा पर यदि तुम यश चाहोगे तो वो बिन कर्मों के न मिल पाएगा।।। रह जाएगी सुंदरता धरी, व्यक्तित्व अटल बह जाएगा। यदि सुनियोजित कर्मों का साथ उन्हे नहीं मिल पाएगा। जग सुनता है कर्मों को सब समझते है लम्हों को शब्दो का ही सारा दायित्व नहीं होता कर्मों का भी होता है मौनभाष।।।।।। कहीं सुना था बचपन में चर्म नही किसी काम की इसे चमकाने की जी तोड़ मेहनत है पर कर्म पर मेहनत क्यों नहीं, चमकाते क्यों नहीं अपनी कर्म की क्षमता अपनाते क्यों नहीं अपने कर्मों का धैर्य नापते क्यों नहीं अपने कर्मों का साहस बनाते क्यों नहीं कार्मिक तन।।।। बिना कर्म के चल न पाए ये जग, ये देश, ये राज्य, ये शहर और ये घर जो मेरा संसार है, मेरे उचित कर्मों के बिना ये बेज़ार है।।।।। मेरे उचित कर्म मेरी पीढ़ी को नई ऊर्जा दे जाएंगे। ...