कितना मुश्किल है ⟴⟴⟴⬲⬲⬲ संतुलन बना पाना जीवन में एक तराजू की तरह जैसे अपने पलड़ो पर भार रखती हुई , वह बनाती है संतुलन !🙏 गर मै खुद को तराजू समझू , तो क्या बना पाउंगी संतुलन तराजू के दो पलड़े और मेरे ????? रसोई , साफ़ सफाई , बच्चों की पढाई , माता -पिता, सास ससुर की आशाएं पति की इच्छाएँ , स्वयं की इच्छाएँ , नौकरी पडोसी , समाज इतने पलड़ो में तो कई तराजू होंगी पर मै??????तो बस एक एक संतुलन बन पाए तो दूसरा बिगड़ जाए आए दिन बिगड़े पलड़े को सँवारने की जद्दो -जहद कभी -कभी तो अपना मानसिक संतुलन ही बिगड़ जाए। खैर उसकी किसे चिंता जब मुझे ही नहीं , करनी तो पड़ेगी ! अच्छा मान लो दो ही पलड़े है नौकरी और घर पर........क्या दोनों बराबर है अब बताओ कौन सा कम है बड़ा विचित्र है इनका खेल संतुलन बनाए नहीं बनता, बस बिगड़ता ही रहता है ! उसके साथ बिगडती है,,,,,, हमारी सोच , हमारी इच्छाएँ हमारी सामाजिक , आर्थिक स्थिति और सबसे ज़रूरी हमारी शारीरिक स्थिति !!!!!...