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bhoolkar

तुम भूलकर भी नहीं भूल पाते हो, कि तुम एक मर्द हो। तुम्हे याद रखने से भी याद नहीं रहता कि मैं भी एक इंसान हूं। शायद मर्द नहीं जानते इंसानियत का अर्थ शायद ये पाठ फाड़ दिया जाता है उनके सिलेबस से।

आज फिर

 आज फिर याद आई तेरी क्या करूं______???? आज फिर मन में फ़रियाद आई तेरी क्या करूं______???? आज फिर मन बेबस है क्या करूं_______???? आज फिर दुखी मन है क्या करू_______???? आज फिर तेरा जिक्र हुआ क्या करूं______???? आज फिर दिल धक से हुआ क्या करूं______???? आज फिर तेरा चेहरा सामने प्रतीत हुआ क्या करूं_________???? मन की खुशी एक पल में फुर्र हुई तेरे चेहरे की हंसी एक पल में सामने हुई लगा जैसे जीवन फिर वापिस आया क्षणिक जीवन का अब मैंने आनंद उठाया ।

कर्म

नहीं चर्म को पूजता कोई, ना ही शीश नवाता है बिना कर्म के तो प्रभु का भी सुमिरन नही हो पाता है। उनसे भी इच्छा रहती है , हमारे लिए कुछ खास करें। तो तुम तो एक अबल मानव हो तुमको कैसे याद करे। यदि कर्म तेरे किसी लायक होंगे तो, जग उनका ही गुणगान करे।।।।। तू बिन कर्मों के चाहे वैभव वो तो शायद तुझे मिल जाएगा पर यदि तुम यश चाहोगे तो वो बिन कर्मों के न मिल पाएगा।।। रह जाएगी सुंदरता धरी, व्यक्तित्व अटल बह जाएगा। यदि सुनियोजित कर्मों का  साथ उन्हे नहीं मिल पाएगा। जग सुनता है कर्मों को सब समझते है लम्हों को शब्दो का ही सारा दायित्व नहीं होता कर्मों का भी होता है मौनभाष।।।।।। कहीं सुना था बचपन में चर्म नही किसी काम की इसे चमकाने की जी तोड़ मेहनत है पर कर्म पर मेहनत क्यों नहीं, चमकाते क्यों नहीं अपनी कर्म की क्षमता अपनाते क्यों नहीं अपने कर्मों का धैर्य नापते क्यों नहीं अपने कर्मों का साहस बनाते क्यों नहीं कार्मिक तन।।।। बिना कर्म के चल न पाए ये जग, ये देश, ये राज्य, ये शहर और ये घर जो मेरा संसार है,  मेरे उचित कर्मों के बिना ये बेज़ार है।।।।। मेरे उचित कर्म मेरी पीढ़ी को नई ऊर्जा दे जाएंगे। ...

कितना मुश्किल है ????????

कितना मुश्किल है ⟴⟴⟴⬲⬲⬲ संतुलन बना पाना  जीवन में  एक तराजू की तरह  जैसे अपने पलड़ो पर भार  रखती हुई , वह बनाती है संतुलन !🙏 गर मै खुद को तराजू समझू , तो क्या बना पाउंगी संतुलन  तराजू के दो पलड़े और मेरे ????? रसोई , साफ़ सफाई , बच्चों की पढाई , माता -पिता, सास ससुर की आशाएं  पति की इच्छाएँ , स्वयं की इच्छाएँ ,  नौकरी  पडोसी , समाज  इतने पलड़ो में तो कई तराजू होंगी  पर मै??????तो बस एक  एक संतुलन बन पाए  तो दूसरा बिगड़ जाए  आए दिन बिगड़े पलड़े को  सँवारने की जद्दो -जहद  कभी -कभी तो अपना  मानसिक संतुलन ही बिगड़ जाए। खैर उसकी किसे चिंता  जब मुझे ही नहीं , करनी तो पड़ेगी ! अच्छा मान लो  दो ही पलड़े है  नौकरी और घर  पर........क्या दोनों बराबर है  अब बताओ कौन सा कम है  बड़ा विचित्र है इनका खेल  संतुलन बनाए नहीं बनता,  बस बिगड़ता ही रहता है ! उसके साथ बिगडती है,,,,,,  हमारी सोच , हमारी इच्छाएँ  हमारी सामाजिक , आर्थिक स्थिति  और सबसे ज़रूरी हमारी  शारीरिक स्थिति !!!!!...

गरीब का बेटा

 गरीब का बेटा  अभावों का मारा  जिसका बाप,,  घिसता है  दिन रात  अपनी चप्पलों को  और एडियों को भी  फिर भी नहीं पढ़ा पता  किसी मान्यता प्राप्त विद्यालय में,,,  रूह कांपती है उसकी  जब वह सोचता है कि उसके बच्चे उसके जैसा काम करेंगे  वह चाहता है उनका जीवन संवारना  लाखों जतन  के बाद  वो जुगाड़ लगता है  किसी से शिक्षा के अधिकार को सुनता है  पर नहीं मिल पाता  right to education उसके बच्चों को वो भी उन्ही को मिलता है  जिनमे पैसे की ताकत होती है  निम्न दर्जे के सहकारी विद्यालय में  पढता है वह गरीब का बेटा  जैसे तैसे पढ़ते है शिक्षक  औसत दर्जे से होता है पास  इतने जातां के बाद  अब मिली ये शिक्षा  जिसने उसे कहीं का न छोड़ा  न निम्न दर्जे का काम कर सकता है  और न अफसर बन सकता है  अब करे तो क्या  यह गरीब का बेटा  पिता में नहीं है सामर्थ्य इतना  कि जुटा पाए महंगे कोचिंग्स की फीस   बेच पाए खेत , तोड़ पाए FD's  और लगाए शिफारिश उसके लिए...

तेरा प्यार

शायद तेरे प्यार के दायरे मेरे आसमान से छोटे थे दरम्यान तेरे प्यार के मै किनारों से फिसल गई ! जब जब मैंने पुकारा तुझे तू अपने दायरों में ही सिमटा रहा। तुमने खुलकर कभी, हंसी को न जिया मेरी हंसी आसमान की रौनक थी। तेरे दायरों में मेरी हंसी न बंध सकी हवा के बहावों से वो गूंजती रही। कुछ जैसे सिमटा है तुझमें जिससे मै लिपटी रही। शायद मेरा जहां बसा है तुझमें जिसमे मैं बसी रही। तू रूह को छू सकता है मेरी मै रूह हूं जिस्म नहीं कुछ कट सा रहा है हम दोनों के बीच में। शायद रूह का बंधन है अब ये जिस्मानी ही सही। कभी रूठी को मनाओ तो सही कभी अपनापन दिखाओ तो सही चांद लाने का वादा करती हूं कभी पैर बढ़ाओ तो सही।।।।।।।।।।।।।।।।

स्वयं की कीमत

  कितनी सस्ती हूं मैं ?? खरीद लेते हो मुझे तुम ,,,,   यू ही पैसे लेकर  यहां कोई खरीददारी का नियम भी  काम नहीं करता ये तो सस्ते से भी सस्ता है लुभाब भी नहीं मैं तो....... जो समान खरीदने पर मिलता है। ये तो ऐसे हैं जैसे  समान भी दुकानदार दे और लुभाब भी सचमुच free शब्द भी छोटा है मेरे लिए......... मुझे तो अवांछित कहना सही होगा। जो समान के लालच में लाई जाती है। और काम में लगाई जाती है, उससे सेवा करवाई जाती हैं  और बदले में दी जाती हैं सिर्फ नसीहतें। हंसी आती है औरत की लाचारी पर उसने अपने पर .........खुद ही काटे हैं। एक औरत ही देती है....... हर रोज़ ताना, ,,,,, कि सामान अच्छा नहीं दिया। एक औरत ही कहती है औरत को ज्यादा छूट मत दो। और एक औरत ही कहती है औरतों में दिमाग नहीं होता कैसी विडंबना है ये,  तुमने कैसा जाल बुन लिया है पुरुषों की खुशी के लिए, जब तक स्वयं की कीमत  नहीं समझोगी........  समाज को क्या बतलाओगी।