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Showing posts from January, 2023

जीवन अंकुर 🌱

 जीवन अंकुर सूख रहा है।🍃🌱🌱☘️ मुझसे मेरा कुछ छूट रहा है। पल - पल हर पल भाग- भागकर🏃🏃 मैं कुछ पाती जा रही हूं, पर उसका क्या.......... जो छूट रहा है। वात्सल्य प्रेम भरी नज़रें अब,  खोती जा रही हूं! श्रृंगारिक प्रेम की भी कुछ बूंदे ही बाकी हैं जीवन का रूखापन दिखने लगा है रूखी होती चर्म की तरह,,,,,, रूखे होते मर्म की तरह। न जानें किसी से हम अब, सुनना, सुनाना पसंद नही करते । किसी की यादों से भी गले नहीं मिलते। बस अनदेखा सा करने लगे हैं ,सबको शायद खुद को भी। अब तो भगवान से भी बचते हैं। पता नहीं क्या चाहते हैं हम, ऐसा लगता है अब इंसान नहीं रहे। कोई कठपुतली सी हो गए हैं हम, हमारी जड़े जो सूख रही हैं,,,,, जीवन अंकुर जो सूखने लगा है, क्या  ,,,, इसका कोई उर्वरक नहीं।।।।।।❄️❄️❄️

तेरा तराना ❤️

❤️❤️❤️तेरे तरानों में झरोखा ,,,,,मैंने बुना है। मेरी तन्हाइयों में  बस ,,,,,,,तेरी जगह है तेरे दर्द को बांट लू मैं ,,,,कहां औकात मेरी। मेरे दर्द में तो बस ,,,,,,तू ही रहनुमा है। तू मंज़िल है मेरी,,,,,, तू मेरा है साहिल तेरी दौड़ में मैं,,,, दुनिया से अंधी बनकर लहरें हूं,,,,, तुझसे उलझती यही मेरा जीवन, ,,,,,,यही मेरी मर्जी ।।।❤️❤️❤️

शिष्य की कलम से

 👩👦  आज भी याद है, कक्षा का वो दृश्य नए नए शिक्षक का कक्षा में आना कक्षा का खुशी के मारे उत्साहित हो जाना  आखिर काफी जतन से जो मिले थे गुरुजी थे तो अंग्रेजी के शिक्षक पर उनका हिंदी मे शायरी सुनाना  जो कुछ इस प्रकार थी। "जीत बुरी लगती है, हार अच्छी लगती है, तुम लोगो को हमारी, हर बात बुरी लगती हैं" वैसे तो अपनी कक्षा में बहुत सभ्य थे हम,  अनुशासित बच्चों में अग्रणी थे हम.... परंतु शायरी सुनकर मन का कवि जागा, और हमने शायरी का प्रत्युत्तर दे डाला। जो कुछ इस प्रकार थी _____ "हार बुरी लगती है, जीत अच्छी लगती है,  हम लोगो को आपकी हर बात अच्छी लगती है।" फिर न जाने क्या हुआ हमें समझ नहीं आया शायद उस शिक्षक का अहम डगमगाया और वो ज़ोर से चिल्लाया, "ए खड़ी हो जा, घणी बोल री मैं बणाऊंगा तनै शायर " कुछ तार जैसा मारक यंत्र था हाथ में उनके  उन्होंने तब तक बजाया , जब तक मन नहीं भरा अब हमनें रोना शुरु किया और कक्षा के बाकी बच्चों ने हंसना  कुछ घनिष्ट मित्रों ने दया दिखाई  और प्राचार्य जी से शिकायत की सलाह दे डाली।  पहले तो डरे हम , फिर चले गए हम अपने एक ...

तुम इंसान नहीं शायद

 बहुत खुश हूं मैं कि मैं एक स्त्री हूं। पर समाज कहता है, कि मैं तुम्हे आइना दिखाया हूं पर कैसे .......?????? तुम बेटी हो,  तुम बहन हो तुम बहु हो तुम मां हो पर शायद तुम इंसान नहीं हो ..... इंसान तो शायद कोई बेटा कोई भाई कोई पति या कोई पिता  ही होता है..... तभी तो तुम्हारे पैदा होने पर छा जाती है मायूसी,,,, कुछ चेहरे हंसते हुए दिखते हैं पर शायद हंसी अंदर नहीं जाती  कभी -कभी कहीं आंसुओ से भरे चेहरे और गहरी छा जानें वाली उदासी। तुम बेटी हो, ,,, तुम बहन हो,,,, तुम बहु हो , तुम मां हो  पर शायद तुम इंसान नहीं हो । तुम ज्यादा हंसा मत करो तुम चलते समय इधर - उधर  देखा मत करो सड़क पर गर्दन झुकी होनी चाहिए  रसोई में मां का हाथ बंटाया करो घर का काम करना आना चाहिए पापा और भाई के काम के लिए हमेशा हाज़िर रहो। तुम बेटी हो….................................... पर शायद तुम इंसान नहीं हो दहेज़ का सामान बिलकुल अच्छा नहीं है बहु मेरे बेटे के लायक नहीं है पता नहीं मां ने क्या सिखाकर भेजा है हमें कोई नौकरी नहीं करानी है घर का पूरा ध्यान बहु को ही रखना चाहिए परंतु घर की किसी वस...

मेरे शब्द

 न जानें मेरे शब्द अब मेरी सुनते ही नहीं न जाने कौनसी कीचड़,  में धंसे हैं । वर्षों पहले मेघ गरजे, और वर्षा हुई । न जाने क्यों......... कीचड़ ये सूखी ही नही  क्या सूर्य नहीं उगा अभी तक मेरे अंतर्मन का क्या अभी तक घनघोर अंधेरा है मेरे  भीतर में क्या मैं प्रतीक्षरत हूं नई सुबह की मेरे व्याकुल मन में............. शब्द घूम जाते हैं गोल मेरे शब्द चूम जाते हैं ओष्ठ मेरे परंतु सार्थकता सिद्ध नहीं करते मेरे शब्द दिल की नहीं सुनते। शब्दों का अपना संसार है शायद मै उनके अनुकूल नहीं शब्दों के प्रयोग के लिए शायद मेरी रूह ही प्रतिकूल रही। शब्द दिखाते हैं आडंबरो को ढकोसलों को । शब्द दिखाते हैं नैतिकता को  प्रयोजनों को ।  शब्द देते हैं मान भरी सभा में, शब्द देते हैं अभिमान इस जहां में । शब्द से होती मर्यादा की रक्षा,  शब्द देते बिखेर कुलीनों की आशा। शब्द फेंकते हैं कभी जाल, शब्द देते हैं कभी घाव शब्द करते हैं कभी तार- तार।  शब्द देते हैं कभी मरहम का काम, शब्द बनाते हैं कभी संसार कभी शब्द देते हैं संहार शब्दों को है स्वयं का ज्ञान जो समझ ले शब्दों की महिमा वो नहीं...

अभी तो बस

 मेरे गालो की लालिमा,  मेरे चेहरे की चमक  रौनक है देखो,,,, ये मेरे अधर  अभी  तो....... बस पचास की हूँ मै अभी तो .......बस जवान ही हूँ मै I मेरे सफेद होते बालो का मखौल न उड़ा, मेरे रूखे खड़े बालों पर न नज़रे गडा बयां करती है तेरी नज़रे,,  कुछ उल्टा ही ................. अभी तो..... बस पचास की हूँ मै, अभी तो ......बस जवान ही हूँ मै I मेरी विधिवत आदतों पर तंज न कसो,  बड़ी मेहनत से बन पाई है ये आदतें I अभी तो बनी है गुरूर ये आदते I अभी तो .....बस पचास की हूँ मै, अभी तो....... बस जवान ही हूँ मै I मेरा बेडौल शरीर मेरी अमानत है , ये मेरी ज़िन्दगी की ज़मानत है I यूं न देख हास्य के लोभ में,  अभी तो....... बस पचास की हूँ मै अभी तो....... बस जवान ही हूँ मै I सपनें अभी है........ कुछ ऊँची उड़ानों के  कुछ शौंक..... और कुछ आदतों के तरानों से  अभी तो;...... गर्दिशों में भी पा लूंगी मंजिल को  अभी तो.... बस पचास की हूँ मै, अभी तो.... बस जवान ही हूँ मै I

तनाव का संतुलन

                        सुनो ......  मन में मत रखा  करो ,                              किसी की कडवी बातों को                             भूल जाया करो ,,, कभी भी                               किसी की ...... कडवी यादों को                                                      पर... ....क्या कर पाते हो ऐसा ??????                                  क्या ये करना आसान है ??                                  ...